Munshi Premchand

Munshi Premchand Biography – Work, Life, Quotes, Achievements

कला केवल यथार्थ की नक़ल का नाम नहीं है,

कला दिखती तो यथार्थ है,

पर यथार्थ होती नहीं |

उसकी खूबी यही है की यथार्थ मालूम हो |

मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की ये पंक्तिया उनकी रचनातनक विशेषताओं को दर्शाती है तथा प्रस्तुत करती है की वह जीवन को काफी नजदीकी से समझते तथा उसे अपनी कहानियो में बड़े ही रचनात्मक तरीके से उन्हें जगह देते थे | प्रेमचंद को उनकी रचनातनक विशेषताओं तथा हिंदी-साहित्य में उनके योगदान की वजह से उन्हें ये नाम मिले |

  • कलाम का जादूगर
  • सब्दो का शिल्पी प्रेमचंद
  • शब्दो का शिल्पी
  • उपन्यास सम्राट
  • हिंदी साहित्य का प्रारम्भ करता

मुन्शी प्रेमचंद के बारे में कुछ तथ्य | MUNSHI PREMCHAND QUICK FACTS

जन्म31, july 1880
उपनाम (Pen Name)नवाब राय
बचपन का नामदंपत राय
गाँवलमही वारणशी
दादागुरु सहाय राय
पिताअजैब राय
माताआनंदी देवी
शादी१८९५ जब वह सिर्फ १५ साल के थे
दूसरा विवाह१९०६ में एक विधवा से शादी कर ली
मृत्यु8, october, 1936

परंतु ये सभी उपमाएं भी मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) के व्यक्तित्व के सामने छोटी लगती है तथा हिंदी साहित्य के लिए उनके द्वारा किये गए योगदान को पूरी तरह नहीं दरसा सकती| पूरा संसार उन्हें मुंशी प्रेमचंद के नाम से जानता है परंतु उनका असली नाम दनपत राय श्रीवास्तव है तथा अपनी शुरुआती रचनाओ के लिए उन्होंने पेन नेम (Pen Name) नवाब राय का प्रयोग किया था |

मुंशी प्रेमचंद सिर्फ एक अच्छे कहानीकार ही नहीं थे उसके साथ को एक अच्छे उपन्यासकार, नाटककार, निबंध रत्नाकर भी थे जो उनकी विभिन्न प्रतिभाओं को दर्शाती है | इसके साथ साथ उन्होंने कई अंग्रेजी किताबो का हिंदी अनुवाद भी किया

31 july १८८० (1980) उनका जन्म वाराणशी से नजदीक लमही गांव के कायस्थ परिवार में हुआ | यह एक छोटा गाँव था जहाँ की कुल आबादी बहुत काम थी | उनके दादा जी पटवारी थे तथा उनके पिता क्लर्क की नौकरी करते थे | मुंशी प्रेमचंद के जीवन की वो घटनाएं जिन्होंने उनकी जिंदगी को पूरी तरफ से बदल दिया तथा उनके जीवन को साहित्य की तरफ मोड़ दिया |

मुंशी प्रेमचंद के जीवन की कुछ दुखद घटनाएं | TRAGEDIES OF MUNSHI PREMCHAND LIFE

उनके जीवन में कई ऐसी बुरी घटनाएं हुई जिन्होंने उनके जीवन को पूरी तरह से प्रभावित किया |

  • जब वह सिर्फ ८ साल के थे उनकी माता का निधन हो गया जिस वजह से वह वो अपने माँ के प्यार से पूरी तरह से अलग हो गए |
  • माता के निधन के बाद उनके दादाजी ही थे जो उनके सबसे ज्यादा पास थे परंतु कुछ समय बाद ही उनका भी निधन हो गया |
  • इसके बाद उनके पिता ने दुबारा शादी की जो मुंशी प्रेमचंद के लिए मुसीबत से ज्यादा कुछ भी नहीं था |
  • फिर छोटी उम्र में उनका विवाह हो गया जिससे वह कभी खुश नहीं थे और ये शादी तलाक के साथ खत्म  हुई |
  • फिर अपने असफल विवाह के पश्च्याताप के लिए उन्होंने एक विधवा से शादी कर लिया |

इस तरह की और भी काफी घटनाएँ उनके जीवन में हुई जिन्होंने उनके अंतर-मन को काफी प्रभावित किया जिस वजह से उनका जीवन को देखने का नाजीरिया पूरी तरह से बदल गया था और धीरे धीरे उन्होने पूरी तरह से खुद को साहित्य से जोड़ लिया

मुंशी प्रेमचंद का परिवार | FAMILY OF MUNSHI PREMCHAND

मुंशी प्रेमचंद का जन्म एक कायस्थ परिवार में हुआ था तथा उनके दादा जिनका नाम गुरु सहाय राय गाँव के पटवारी थे और उनके पिता अजैब राय एक पोस्ट ऑफिस के क्लर्क थे | उनकी माता आनन्दी देवी का निधन हो गया था जब प्रेमचंद सिर्फ ८ साल के थे | अजैब राय और आनन्दी देवी की चार संतान थी और प्रेमचंद उनके चौथे नंबर के संतान थे तथा बाकी की तीन लड़कियां थी जिनमे से दो की म्रत्यु बचपन में ही हो गई थी | अगर प्रेमचंद की बात करे तो अपने जीवन काल में उन्होंने दो शादियां की पहली शादि उनकी बाल अवस्था में ही हो गयी थी जब वह सिर्फ १५ साल थे उसके बाद उनकी पहली पत्नी पारिवारिक कलेश के कारण घर छोड़ कर अपने माँ बाप के घर चली गयी और कभी वापस नहीं आयी | उसके बाद उन्होंने एक विधवा लड़की से शादी कर ली |

पिता का दूसरा विवाह | SECOND MARRIAGE OF PREMCHAND FATHER

प्रेमचंद की माता आनन्दी देवी का निधन हो गया था जब प्रेमचंद सिर्फ ८ साल के थे उसके कुछ समय बाद उनके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया | इस समय उनके पिता शारीरिक रूप से पूरी तरफ स्वस्थ नहीं थे जिन कारणों से प्रेमचंद को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा | अपनी सौतेली माँ से उन्हें कभी उतना प्यार हासिल नहीं कर पाए | प्रेमचंद के शादी के पस्चात उनकी परेशानियाँ और भी बढ़ गयी क्योंकि सास बहु में हमेशा किसी न किसी बात को लेकर लड़ाई होती रहती थी

प्रेमचंद का वैयवाहिक जीवन | MUNSHI PREMCHAND MARRIAGE

प्रेमचंद ने अपने जीवन काल में दो शादियां की पहली शादी से वह खुश नहीं थे इसके पीछे दो कारण है

पहला कारण: जिस समय उनके पिता ने उनका विवाह तय दिया था उस समय वह सिर्फ १५ साल में थे और अपने स्कूल के परीक्षा की तयारी कर रहे थे |

दूसरा कारण : शादी से पहले उन्होंने अपनी होने वाली पत्नी को कभी देखा नहीं था | जब शादी के पस्चात उन्होंने अपनी पत्नी को पहली बार देखा तो पाया की वह एक बदसूरत लड़की थी और उसके चेहरे पर काफी दाग थे |

शादी के बाद सास बहु की लड़ाई आम बात थी और यह रोजाना की बात थी जिस वजह से प्रेमचंद के जीवन अशांति से भर गया था और कुछ वर्ष के बाद एक दिन उनकी पत्नी ने रोज की कलेश से परेशान हो कर घर छोड़ने का निश्चय किया और कभी लौट कर नहीं आयी

कुछ वर्षो बाद भी जब वह लौट कर नहीं आयी तो प्रेमचंद ने एक विधवा लड़की से शादी कर ली जिसके शादी के कुछ समय बाद ही उसके पति की मृत्यु हो गयी थी

मुंशी प्रेमचंद और साहित्य | MUNSHI PREMCHAND AND HINDI SAHITYA

प्रेमचंद ने अपने लेखन में गरीब किसानों, दलितों, महिलायों तथा उनके साथ होने वाली समस्याओ, सामाजिक कुसंस्कारो आदि को ख़ास जगह दी | प्रेमचंद को एक अच्छा प्रेक्षक भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने बड़े ही बारीकी से गरीबो, किसानों, दलितों के जीवन तथा उनके जीवन में होने वाली परेशानियों को समझा और बड़े ही रचनात्मक ढंग से उन्हे अपने लेखन में प्रस्तुत किया |

१९०५ से १९०९ का जो समय था वह उन्होंने कानपुर में बिताया जहाँ उनकी मुलाकात ज़माना मैगज़ीन के संपादक नारायण निगम से हुई बाद में चल कर इसी मैगज़ीन में उनके कई लेख और कहानियां प्रकाशित हुई | उनकी पहली कहानी “दुनिया का सबसे अनमोल रतन” भी जमाना मैगज़ीन में १९०७ में प्रकाशित हुआ था |

इन्ही कुछ वर्षो में एक बार प्रेमचंद की पत्नी ने आत्महत्या करने का प्रयत्न भी की किया परंतु वह बच गई और बाद में घर छोड़ने का निस्चय किया और कभी लौट कर नहीं आयी और नाही प्रेमचंद ने कभी कोशिश की उनको वापस लाने की | और १९०६ में उन्होंने एक विधवा से शादी कर ली जो एक साहसी कदम था क्योंकि समाज में विधवा का दूसरा विवाह प्रतिषिद्ध था और इसे काफी बुरी नजर से देखा जाता था | प्रेमचंद को अपने इस निर्णय की वजह से समाज में काफी आलोचना भी उठानी पड़ी थी |

MUNSHI PREMCHAND IN 1907 | १९०७ में मुंशी प्रेमचंद

१९०७ में प्रेमचंद ने दुनिया का सबसे अनमोल रतन के अलावा ३ और अन्य लेखन प्रकाशित हुए जिन में ये नीचे लिखे लेखन शामिल है |

प्रेमा (1907) : प्रेमचंद का यह उपन्यास विधवा पुनर्विवाह पर आधारित था जिन में प्रेमचंद ने विधवा पुनर्विवाह से जुडी सभी प्रथाओ और उनपे होने वाले सभी तरह की उत्पीरण को दिखने की कोशिश की है | की कैसे कहानी का नायक अमृत राय एक विधवा से शादी करने के कारण समाज और उनके खोखले रीती रिवाजो से लड़ता है |

किष्णा : १९०७ में ही उनकी एक और उपन्यास प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक किष्णा था मेडिकल हाल प्रेस के द्वारा इसे प्रकाशित किया गया था जिसमे प्रेमचंद ने महिलाओं के आभूषण के प्रति प्रेम पर व्यंग्य किया था

सोज़-ए-वतन : १९०७ में ही उनकी विवादास्पद लघु कथाओ का संग्रह सोज़-ए-वतन भी प्रकाशित हुआ था जिस पर बिर्टिश सरकार ने प्रतिबंधित लगा दिया क्योंकि उनका कहना था ई यह बिर्टिश सरकार के विरुद्ध थी | प्रेमचंद ने सोज़-ए-वतन में देश भक्ति की लघु कथाए लिखी थी जिसे पढ़ने के बाद बिर्टिश सरकार को लगा की यह लोगो में बिर्टिश सरकार के प्रति क्रांति का कारण बन सकती थी और यह पूरी तरह उनके खिलाफ थी |

yearMunshi Premchand
1880इसी वर्ष के दिन हिंदी साहित्य के एक महान लेखक का जन्म हुआ
1887इस वर्ष उनकी माता का निधन हुआ जब वह सिर्फ ७ साल के थे |
1890बनारस के कुईन कॉलेज में भर्ती लिया
1895इस समय वह सिर्फ १५ साल के थे जब उनकी शादी हुई
1897उनकी शादी के दो साल बाद ही उनके पिता का निधन हो गया |
1899चुनर के मिशनरी स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिल गयी |
1900सरकारी जिला स्कूल (बहराइच) में सह अध्यापक के तौर पर नौकरी स्थायी हो गयी |
1905इस वर्ष कानपुर हस्तांतरण हो गया और यहाँ वह दया नारायण निगम से मिले जो ज़माना मागज़ीने के संपादक थे जहा उन्होंने अपने कई शरुआती लेखन को प्रकाशित किये |
1906पत्नी के घर छोड़ देने के बाद जब वह कुछ साल बाद भी वापस नहीं आयी तो इस वर्ष उन्होंने एक विधवा से शादी कर ली |
1907इस साल उन्होंने अपने चार प्रारम्भिक लेखन को ज़माना मैगज़ीन के साथ प्रकाशित किया |
1915उनकी पहली हिंदी कहानी "सौत" इस वर्ष दिसंबर में प्रकाशित हुई थी |
1917इस साल उनकी पहली लघु कहानी संग्रह सप्त सरोज प्रकाशित हुई |
1921स्कूल के उप निरीक्षक के पद पर उनकी पदोन्नति कर दी गयी | परंतु इसी वर्ष उन्होंने अपने नौकरी से इस्तीफा दे दिया क्योंकि इस समय महात्मा ग़ांधी असहयोग आन्दोलन कर रहे थे और लोगो से यह निवेदन किया था की सभी लोग सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे कर इस आंदोलन में अपना सहयोग दे |
1930इस वर्ष उन्होंने हंस नामक साहित्यिक-राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिका की स्थापना की
1931इस साल प्रेमचंद कानपुर आये और मारवाड़ी कॉलेज में नौकरी प्राप्त की परंतु उसी साल इस नौकरी से इस्तीफा दे दिया और मर्यादा पत्रिका के संपादक बन गए |
1934इस साल वह मुंबई में आकर प्रोडक्शन हाउस अजंता सिनेटोन में स्क्रिप्ट लेखक के तौर पर एक साल के लिए अनुबंध हस्ताक्षर किया | जहाँ उन्होंने फिल्म मज़दूर के लिए स्क्रिप्ट लिखी |
1935स्क्रिप्ट लेखक की नौकरी छोड़ दी और मुम्बई से वापस लौट आये |
1936इस वर्ष 8 october को उनका निधन हो गया |

मुंशी प्रेमचंद के प्रमुख पंक्तियाँ | MUNSHI PREMCHAND QUOTES

जीवन में सफल होने के लिए आप को शिक्षा की जरुरत है ना की साक्षरता और डिग्री की |

धन और करुणा एक दूसरे से पूरी तरह विपरीत हैं
विनम्रता के साथजीने वाला व्यक्ति, समाज में सभी का प्रेम मिलता है |

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मुन्शी प्रेमचंद की कहानियां
अलग्योझा)मनुष्य का परम धर्ममुक्तिधन
माँगुरु-मंत्र)लाग-डाट
बेटों वाली विधवासौभाग्य के कोड़ेआमावस्या की रात
बङे भाई साहबविचित्र होलीचकमा
शान्तिमुक्ति-मार्गपछतावा
नशाडिक्री के रुपयेआप-बीती
स्वामिनीशतरंज के खिलाड़ीराज्य-भक्त
ठाकुर का कुआँवज्रपातअधिकार-चिन्ता
घर-जमाईसत्याग्रहदुराशा
पूस की रातभाड़े का टट्‍टू)जेल
झांकीबाबा जी का भोगपत्नी से पति
गुल्ली-डंडाविनोदशराब की दुकान
ज्योतिप्रेरणाजुलूस
दिल की रानीसद्गतिमैकू
धिक्कारतगादासमर-यात्रा
कायरदो कब्रेंशांति
शिकारढपोरशंखबैंक का दीवाला
सुभागीडिमॉन्स्ट्रेशनआत्माराम
अनुभवदरोगा जीदुर्गा का मंदिर
लांछनअभिलाषाबङे घर की बेटी
आखिरी हीलाखुचङपंचपरमेश्वर
तावानआगा-पीछाशंखनाद
घासवालीप्रेम का उदयज़िहाद
गिलासतीफ़ातिहा
रसिक सम्पादकमृतक भोजवैर का अंत
मनोवृत्तिभूतदो भाई
कुसुमसवासेर गेहूँमहातीर्थ
खुदाई फौजदारसमस्याविस्मृति
वेश्यादो सखियांप्रारब्ध
चमत्कारमांगे की घङीसुहाग की साड़ी
मोटर के छींटेस्मृति का पुजारीलोकमत का सम्मान
कैदीमंदिरनागपूजा
मिस पद्मानिमंत्रणखून सफेद)
विद्रोहीरामलीलागरीब की हाय
उन्मादकामना-तरुबेटी का धन
न्यायहिंसा परम धर्मधर्मसंकट
दो बैलों की कथाबहिष्कारसेवा-मार्ग
रियासत का दीवानचोरीशिकारी राजकुमार
मुफ्त का यशलांछनईदगाह
दूध का दामसतीबलिदान
बालककज़ाकीबोध
जीवन का शापसुजान भगतसच्चाई का उपहार
दामुल का कैदीपिसनहारी का कुआंज्वालामुखी
नेऊरसोहाग का शवपशु से मनुष्य
लॉटरीआत्मसंगीतमूठ
जादूएक्ट्रेसब्रह्म का स्वांग
शूद्राईश्वरीय न्यायविमाता
विश्वासममताबूढ़ी काकी
नरक का मार्गमंत्रहार की जीत
स्त्री और पुरुषप्रायश्चितदफ़्तरी
(उद्धारकप्तानसाहबविध्वंस
निर्वासनइस्तीफ़ास्वत्व-रक्षा
नैराश्य लीलायह मेरी मातृभूमि हैपूर्व संस्कार
कौशलत्यागी का प्रेमदुस्साहस
स्वर्ग की देवीत्यागी का प्रेमबौड़म
आधाररानी सारन्धागुप्त धन
एक आँच की कसरशापआदर्श विरोध
माता का हृदयमर्यादा की वेदीविषम समस्या
परीक्षामृत्यु के पीछेअनिष्ट शंका
तेंतरपाप का अग्निकुंडसौत
नैराश्यआभूषणसज्जनता का दंड
दंडजुगनू की चमकनमक का दारोगा
धिक्कारगृह दाहउपदेश
लैलाधोखादीक्षा
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निर्मलागबन
गोदानरंगभूमि
अलंकारप्रतिज्ञा
प्रेमाकर्मभूमि
प्रेमाश्रम

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